
कोरबा। शिक्षा किसी भी बच्चे का मौलिक अधिकार है और बेहतर भविष्य की सबसे मजबूत नींव भी। सरकार बच्चों को स्कूल से जोड़ने के लिए निःशुल्क शिक्षा, पाठ्यपुस्तकें, यूनिफॉर्म, छात्रवृत्ति, सुबह का नाश्ता और दोपहर के भोजन जैसी अनेक सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास कर रही है। उद्देश्य स्पष्ट है कि आर्थिक तंगी किसी भी बच्चे की शिक्षा में बाधा न बने। लेकिन जमीनी हकीकत का एक दूसरा चेहरा भी है, जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब बच्चा स्कूल तक पहुंच ही नहीं पा रहा, तो उसके लिए बनाई गई योजनाओं का लाभ आखिर उसे कैसे मिलेगा?
क्या सिर्फ स्कूल में भोजन की थाली उपलब्ध करा देने से बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित हो जाएगी? क्या सरकारी योजनाओं की सफलता केवल नामांकन और भोजन वितरण के आंकड़ों से तय की जा सकती है? या फिर उन परिस्थितियों को भी समझना होगा, जिनके कारण हजारों बच्चे स्कूल जाने की उम्र में घर की जिम्मेदारियों के बीच अपना बचपन खो रहे हैं?
यह समस्या केवल स्कूल से अनुपस्थित रहने वाले बच्चों की नहीं है, बल्कि गरीबी, बेरोजगारी, असंगठित मजदूरी, पारिवारिक मजबूरियों और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी एक गंभीर चुनौती है।
गरीबी की मार और जिम्मेदारियों का बोझ उठा रहा बचपन
हमारे समाज में आज भी ऐसे अनेक परिवार हैं, जिनकी रोजी-रोटी रोज की मजदूरी पर निर्भर है। माता-पिता सुबह होते ही काम की तलाश में घर से निकल जाते हैं। कोई निर्माण स्थल पर मजदूरी करता है, कोई ईंट-भट्ठे में काम करता है, तो कोई खेतों, कारखानों और दूसरे असंगठित क्षेत्रों में मेहनत-मशक्कत कर परिवार का पेट पालता है।
इन परिवारों की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर होती है कि घर चलाने के लिए माता-पिता दोनों का काम पर जाना कई बार मजबूरी बन जाता है।
लेकिन इस मजबूरी का सबसे बड़ा बोझ किस पर पड़ता है?
उस बच्चे पर, जिसकी उम्र स्कूल जाने, खेलने और अपना भविष्य संवारने की होती है।
जब घर में छोटे भाई-बहनों की देखभाल करने वाला कोई नहीं होता, तब बड़ी उम्र के बच्चों को घर पर रुकना पड़ता है। उन्हें छोटे बच्चों को संभालना, खाना खिलाना, घर की देखभाल करना और घरेलू जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं। धीरे-धीरे यही जिम्मेदारियां उनकी पढ़ाई के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बन जाती हैं।
पहले स्कूल से एक दिन की अनुपस्थिति होती है, फिर कई दिन गुजर जाते हैं। पढ़ाई छूटने लगती है, कक्षा में पिछड़ने का डर बढ़ता है और अंततः बच्चा शिक्षा की मुख्यधारा से दूर हो जाता है।
विडंबना देखिए, जिस बच्चे के हाथों में किताबें होनी चाहिए, वह अपने छोटे भाई-बहनों का भविष्य संभालने की जिम्मेदारी उठाने को मजबूर है।
भोजन की थाली से आगे बढ़कर देखनी होगी शिक्षा की असली तस्वीर
सरकारी स्कूलों में सुबह का नाश्ता और दोपहर का भोजन उपलब्ध कराने की पहल निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। इससे बच्चों के पोषण और विद्यालय में उपस्थिति को प्रोत्साहन मिल सकता है। लेकिन क्या भोजन की सुविधा ही शिक्षा से जुड़ी हर समस्या का समाधान है?
अगर बच्चा घर पर छोटे भाई-बहनों को संभाल रहा है, माता-पिता मजदूरी करने गए हैं और परिवार में उसे स्कूल भेजने की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है, तो स्कूल में मिलने वाला नाश्ता और भोजन उसके लिए किसी काम का नहीं रह जाता।
भोजन स्कूल में तैयार हो सकता है, लेकिन बच्चे को स्कूल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी केवल भोजन योजना के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।
यहां शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। बच्चों की अनुपस्थिति को केवल अभिभावकों की लापरवाही बताकर जिम्मेदारी से बचना उचित नहीं होगा। प्रत्येक ऐसे बच्चे के पीछे छिपी पारिवारिक और सामाजिक परिस्थिति को समझना आवश्यक है।
शाला त्यागी बच्चों के आंकड़ों से आगे बढ़कर जमीनी पड़ताल जरूरी
स्कूलों में नामांकित बच्चों की संख्या और नियमित रूप से स्कूल आने वाले बच्चों की संख्या के बीच कितना अंतर है? कितने बच्चे लंबे समय से अनुपस्थित हैं? कितने बच्चों ने बीच में पढ़ाई छोड़ दी है? और सबसे महत्वपूर्ण, आखिर उन्होंने स्कूल क्यों छोड़ा?
इन सवालों के जवाब केवल कार्यालयों में बैठकर तैयार की गई रिपोर्ट से नहीं मिलेंगे। इसके लिए गांवों, बस्तियों और मजदूर परिवारों के बीच जाकर वास्तविक स्थिति का पता लगाना होगा।
शिक्षकों, प्रधानपाठकों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, मितानिनों और पंचायत प्रतिनिधियों को मिलकर ऐसे बच्चों की पहचान करनी चाहिए, जो लगातार स्कूल नहीं आ रहे हैं।
उनके परिवारों से संवाद कर यह जानना होगा कि अनुपस्थिति के पीछे आर्थिक तंगी है, छोटे भाई-बहनों की देखभाल की जिम्मेदारी है, बाल श्रम का दबाव है, पढ़ाई में कमजोरी है या कोई अन्य कारण।
सिर्फ बच्चों का नाम अनुपस्थित विद्यार्थियों की सूची में दर्ज कर देना समस्या का समाधान नहीं है। असली काम तब शुरू होता है, जब विभाग यह पता लगाने का प्रयास करे कि बच्चा स्कूल से दूर क्यों है।
माता-पिता की मजबूरी समझे बिना नहीं बदलेगी स्थिति
गरीब परिवारों के अभिभावक भी अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। वे भी चाहते हैं कि उनके बच्चे उनसे बेहतर जीवन जिएं। लेकिन जब परिवार के सामने दो वक्त की रोटी जुटाने का संकट हो, तब शिक्षा की महत्ता समझने के बावजूद कई बार परिस्थितियां उनके फैसलों को प्रभावित करती हैं।
ऐसे में केवल अभिभावकों को समझाइश देना पर्याप्त नहीं होगा।
जरूरत है कि पात्र परिवारों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ा जाए। बच्चों की देखभाल से संबंधित समस्याओं के समाधान के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों और स्थानीय संस्थाओं की भूमिका मजबूत की जाए। स्कूलों में अभिभावक बैठकें आयोजित हों और परिवारों को यह भरोसा दिलाया जाए कि बच्चों की शिक्षा जारी रखने में व्यवस्था भी उनके साथ खड़ी है।
शिक्षा विभाग की जवाबदेही केवल नामांकन तक सीमित न रहे
अब समय आ गया है कि शिक्षा व्यवस्था में बच्चों की नियमित उपस्थिति और पढ़ाई की निरंतरता को प्राथमिकता दी जाए।
प्रत्येक स्कूल में लंबे समय से अनुपस्थित बच्चों की नियमित समीक्षा होनी चाहिए। ऐसे बच्चों की पहचान के बाद उनके घर तक पहुंचकर वास्तविक कारणों का पता लगाया जाए। जिन बच्चों की पढ़ाई छूट गई है, उनके लिए विशेष शिक्षण व्यवस्था और पुनः प्रवेश की प्रभावी पहल हो।
साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि स्कूल लौटने वाले बच्चों को दोबारा उन्हीं परिस्थितियों का सामना न करना पड़े, जिनके कारण उन्होंने पहले पढ़ाई छोड़ी थी।
शिक्षा विभाग को यह भी देखना होगा कि योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंद बच्चों तक पहुंच रहा है या नहीं। केवल कागजों में नामांकन, उपस्थिति और सुविधाओं का विवरण तैयार कर देने से शिक्षा का उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
समाज की चुप्पी भी इस समस्या को बढ़ाती है
बच्चों को शिक्षा से जोड़ना केवल सरकार, शिक्षा विभाग या शिक्षकों की जिम्मेदारी नहीं है। यह पूरे समाज का दायित्व है।
यदि किसी गांव या बस्ती में कोई बच्चा लंबे समय से स्कूल नहीं जा रहा है, तो क्या आसपास के लोगों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? क्या पंचायत प्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और जागरूक नागरिकों को आगे नहीं आना चाहिए?
समाज को ऐसे परिवारों की समस्याओं को समझना होगा और बच्चों की शिक्षा जारी रखने के लिए सहयोग करना होगा।
विशेष रूप से मजदूर बस्तियों, दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर ध्यान देने की जरूरत है। वहां शिक्षा और बच्चों की देखभाल से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए स्थानीय स्तर पर ठोस कार्ययोजना बनाई जानी चाहिए।
अब सवाल योजनाओं का नहीं, उनके वास्तविक परिणामों का है
सरकारी स्कूलों में नाश्ता और दोपहर का भोजन उपलब्ध कराना एक सकारात्मक पहल है, लेकिन शिक्षा की सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि कितने बच्चे नियमित रूप से स्कूल पहुंच रहे हैं, कितने बच्चे अपनी पढ़ाई पूरी कर पा रहे हैं और कितने बच्चों को बीच में पढ़ाई छोड़ने से बचाया जा सका है।
आज आवश्यकता केवल नए नामांकन की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि उन बच्चों को वापस लाने की है, जो गरीबी और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण शिक्षा से दूर हो चुके हैं।
शासन-प्रशासन को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें बच्चे की अनुपस्थिति को एक साधारण प्रशासनिक आंकड़ा नहीं, बल्कि उसके भविष्य से जुड़ी गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जाए।
अंततः सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि सरकारी स्कूलों में बच्चों को क्या खिलाया जा रहा है, बल्कि सवाल यह है कि जिन बच्चों के पास स्कूल पहुंचने का अवसर ही नहीं है, उनके लिए व्यवस्था क्या कर रही है?
क्योंकि भूखे बच्चे को भोजन देना जरूरी है, लेकिन जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे बच्चे को शिक्षा तक पहुंचाना उससे भी बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी है।
जिस उम्र में बच्चों को अक्षर पहचानने चाहिए, उस उम्र में यदि वे घर की जिम्मेदारियां उठाने को मजबूर हैं, तो यह केवल एक परिवार की विवशता नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक और शैक्षणिक व्यवस्था के सामने खड़ा गंभीर सवाल है।
बच्चों को स्कूल तक लाने के लिए केवल नाश्ते की थाली और दोपहर के भोजन की व्यवस्था काफी नहीं है। गरीबी से लड़ने का साहस, परिवारों को सहारा देने वाली व्यवस्था, शिक्षा विभाग की जवाबदेही और समाज की संवेदनशील भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है।
क्योंकि किसी बच्चे का स्कूल छूटना केवल उसकी पढ़ाई का छूटना नहीं, बल्कि उसके बेहतर भविष्य के एक बड़े अवसर का खो जाना है।
याद रखिए—बच्चों का बचपन घर की मजबूरियों का बोझ उठाने के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा, सपनों और संभावनाओं के साथ आगे बढ़ने के लिए है।




